(आज मई दिवस है। मजदूरों का दिन। मजदूरों ना कहें, कामगारों का दिन। पर अपनी अपनी दुनिया में रमने वाले हम में से बहुत से लोग इस दिन को भूल चुके हैं। जिस लौ को ले कर, ज़िंदगी की, सब की ज़िंदगी को ख़ूबसूरत बनने के सपने देखे थे, वह लौ मरे नहीं, यही कोशिश करनी है। जिस दिन मुक्तिबोध के आत्म की तरह, अपना रास्ता बदल सकूंगी, उस दिन शायद ये अपराध बोध कम हो कि क्या करने चली थी, क्या कर रही हूँ)
गन्दी बस्तियो के पास नाले पार
बरगद है
उसी के श्याम तल में वे
रम्भातीं है गायें।
कि पत्थर ईंट के चूल्हे सुलगते हैं।
फुदकती हैं वोही दो-चार
बिखरे बालो वाले बालकों के श्याम गंदे तन
व लोहे की बनी स्त्री-पुरूष aakritiya
दलिद्दर के भयानक देवता के भव्य चेहरे वे
चमके धुप में
मुझको है भयानक ग्लानी
निकजे के श्वेत वस्त्रों पर
स्वयं की शील शिक्षा सत्य दीक्षा पर
निरोधी अस्त्र शस्त्रों पर
की नगर के सुसंस्कृत सौम्य चेहरों से
उचटता मन
उतारू आवरण
यह साफ गहरा दूधिया कुरता
व चूने की सफेदी में चिकलाते से सभी कपड़े निकालूँगा।
किसी ने दूर से मुझे पुकारा है।
- मुक्तिबोध
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