इंडियन एक्सप्रेस में श्याम बेनेगल ने विजय तेंदुलकर को जो श्रद्धांजलि दी हैं, वह एक दोस्त की श्रद्धांजलि से ज्यादा है। यह एक सृजनकार की दूसरे सृजनकार को दी गई श्रद्धांजलि है। पर यह विनम्रता के साथ कहना पड़ेगा कि विजय तेंदुलकर, श्याम बाबू से फलक में ज्यादा बड़े सृजनकार थे। चूँकि, श्याम बाबू के जिन रूपों को हम उनकी फिल्मो में देखते हैं, उन्हें विजय तेंदुलकर ने ही रचा था। शायद श्याम बाबू वह सिनेमा रच ही नही पाते अगर विजय तेंदुलकर या सत्यदेव दुबे जैसे लोग न होते। विजय तेंदुलकर नाट्य के उन रूपों के रचयिता थे, जिन्हें सिनेमा से आगे की चीज़ माना जाता है। ख़ास बात यह है कि अतीत और आधुनिकता के बीच उन्होंने गजब का सामंजस्य बना कर रखा था। उनके रचे हुए में अतीत को खूबसूरती के साथ पिरोया गया था, लेकिन मजाल है कि उसमें पुरानेपन की गंध आए। इसी तरह नयेपन की ठसक और अपनी बात जोर से बोलने की ताक़त भी उनमें थी। तभी उन्होंने गुजरात हिंसा के बाद यह कहा था कि अगर उनके हाथ में पिस्तौल होती तो वह नरेन्द्र मोदी को मार डालते। कभी फांसी के विरोध में खड़े रह चुके तेंदुलकर के लिए ऐसी बात कहना अजीब जरुर था लेकिन वह ख़ुद भी मानते थे कि यह गुस्सा जायज़ था।
विजय तेंदुलकर में जितना गुस्सा था, उससे ज्यादा चुप्पी भी थी। उनके नाटकों में संवादों के बीच लम्बी चुप्पी होती थी। कई नाटकों में तो संवाद से ज्यादा चुप्पी है। पर जहाँ संवाद नहीं वहाँ उनके परिवेश बोलते हैं। आज विजय तेंदुलकर ने फिर चुप्पी धारण कर ली है। पर उनकी चुप्पी भी बोलती है। उस युग की कहानी दोहराती है, जिसे उन्होंने ख़ुद ही रचा था। बस, उसे समझाने की जरुरत है।
किशन महाराज के बाद विजय जी का जाना, एक और युग का ख़त्म हो जाना है। जाहिर बात है, हर युग का एक अंत होता है। पर उस बीते हुए युग से क्या चुना जा सके, यह महत्व रखता है।
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