आंसू की झिलमिलाती ओस ने
जब भोर का तकिया गीला कर दिया
तब
चुपके से एक नन्ही कोपल
फूट पड़ी मेरे सिरहाने
एक सपने ने ज्यू मेरी आँखों से पूछा हो
कौन हो तुम ... जननी?
कब बुना तुमने मुझे अपनी अलको पर
क्या नाम दोगी मुझे तुम?
क्या पालती रहोगी आने वाली सदियो में?
मैं चुप हूँ- सपने जब ख़ुद से सवाल करते है
तब हमे चुप ही होना होता है।
कोपल ने फूटकर सपनो का लिबास पहन लिया है
जब तक लतर बनती हैं
उसे सींचना ही होगा मुझे...
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