Thursday, April 24, 2008

ख्वाहिश

पिछले कई सालो से ख़ुद की तलाश कर रही हूँ। क्या करने का तय किया था और क्या कर रही हूँ। पापा होते तों कहते, कुछ रचनात्मक करो। संतोष उसी से मिलता है। पर ज़िंदगी में तमाम तरह की जरूरते जुटाने की ख्वाहिश में ख़ुद से ही बिछूड गई। गाँव के खेत अब भी बुलाते हैं। ख्वाहिशों से दूर जाना चाहती हूँ। पर क्या ये कभी सम्भव होगा? ख़ुद से भले बिछूड जाओ, ख्वाहिशों से बिछूडन आसान नहीं

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