Tuesday, April 29, 2008

गुलाम नहीं आजाद

गुलाम मोहम्मद को लोग नहीं जानते। गुलाम जैसो को जानने वाले कम ही होते हैं। इलाहाबाद से लगते हुए नैनी में रहते हैं गुलाम। बीती शुक्रवार को उन्होंने अपनी बेटी की शादी की। निकाह नहीं, शादी की। बेटी का नाम है बबिता और दामाद का नाम बबलू। बबिता गुलाम की मानी हुई बेटी नही। उसे गुलाम ने १४ साल पहले गोद लिया था। बबिता के माता पिता की मौत के बाद गुलाम ने उसे बाकायदा गोद लिया। पर उसके मजहब को नहीं बदला। इसके बाद उसके लिए हिंदू वर भी चुना। शादी में सभी रस्में हिंदू रीति रिवाज से पूरी की गईं। शादी के कार्ड पर गणेशजी की तस्वीर छपवाई गयी। कन्यादान भी किया गया।
गुलाम जैसे शख्स हमारे समाज में आजाद हैं। बेशक नाम से हम उन्हें गुलाम कहें। उन्हें समाज की बंदिशे बाँध नहीं सकतीं। न धरम की रवायतें। वो चाहते तो जिस बेटी को उन्होंने बचपन से पाला इस्लाम में उसका धर्मान्तरण कर सकते थे। यू इससे कोई फर्क भी नहीं पड़ता। पर उन्होंने अपनी बेटी को धरम का नहीं, इंसानियत का पाठ पढ़ना चाहा। यह पाठ किसी भी धार्मिक पाठ से ज्यादा जरूरी है। मुश्किल ये है कि दुनिया भर की किताबे पढ़ने के बाद भी हममें से बहुत से इस पाठ को कंठस्थ नहीं कर पाते।
जो लोग किसी खास कौम या धरम को किसी खास तरह की फितरत वाला बताते हैं, उन्हें गुलाम भाई जैसे लोगो की तरफ़ देखना चाहिए। मजहब नहीं, सारे दायरे इंसान ही बनते हैं और अगर वे चाहे तो उसे दूर भी कर सकते हैं।

No comments: