Wednesday, April 30, 2008

सपने-२

ख़ुद को पहचानने के लिए जब नज़र उठता हूँ
दंश चुभते हैं पलकों पर।
जिन्हें पाला था इन आंखों में
आज वोही सपने छटपटा रहे हैं बाहर निकलने को।
साकार होना हैं उन्हें तो बाहर निकलना ही होगा,
धरातल पर उतरना ही होगा।
मेरे लिए आसान नहीं, उन सपनो को छोड़ना।
अपनी दुनिया रची तो उन सपनों से ही रंग भरे।
आसमान पर बैठाया और उनकी इन्द्रधनुषी रंगत में विभोर हो गया
पर मेरी दुनिया बहुत छोटी हैं, सपने बहुत बड़े।
उन्हें और बड़ा बनना हैं।
और बड़ा...
मेरी दुनिया में अब वो नहीं समायेंगे।


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