Saturday, April 26, 2008

बेशक हमे आगे बढ़ना है

अपने ब्लॉग की शुरुआत कैसे करूँ समझ नहीं आया। मैं कोई बहुत बड़ी जानकर नहीं। किसी विषय पर लिखने या बोलने से पहले मुझे बहुत कुछ पढ़ना पड़ता है। मैं बहुत से लोगो की तरह हर विषय पर नहीं बोल पाती। बोलने में संकोच करती हूँ। सोचती हूँ कि कहीं कुछ ग़लत न बोल दूँ। अपने ब्लॉग में ऐसा क्या लिखूं जो मेरी सोच से मेल खाता हो और दूसरों तक मेरी बात भी पहुँचा सके। मैं कुछ फूहड़ न लिख दूँ। ऐसे में सुभाषिनी अली सहगल ने अनजाने में ही मेरी मदद कर दी।
सुभाषिनी जी एक बहत अच्छी सोच वाली महिला है। नेता नहीं कहूँगी क्योंकि नेता होने से पहले, या कुछ भी होने से पहले हमें एक अच्छी सोच वाला इंसान होना चाहिए। सुभाषिनी जी भी ऐसी ही महिला हैं। पिछले दिनों एक दैनिक अखबार में उनका लेख पढ़ा। मुम्बई की एक ख़बर से जुड़ा था उनका लेख जिसे एक अंग्रेज़ी अखबार पहले छाप चुका था। मुम्बई की एक महिला हैं माधवी कपूर। उन्होंने जब अपना फ्लैट एक बोहरा मुस्लिम परिवार को बेच दिया तो उनके सोसाइटी वाले भड़क गए। वहाँ बहुधा सिन्धी परिवार बसे थे और वे चाहते थे कि किसी मुस्लिम को नहीं, हिंदू खासकर सिन्धी को वह फ्लैट मिले। उन्होंने माधवी को तरह तरह के लालच दिया। फ्लैट के ज्यादा पैसे दिलवाने की बात भी कही पर माधवी नहीं मानी। वह जबान दे चुकी थी। फिर उन्हें मुस्लिम एंगल पर भी ऐतराज़ था। सुभाषिनी जी ने माधवी का समर्थन करते हुए ये लिखा था कि माधवी ने दूषित मानसिकता वाले लोगो से लड़ने का जो इरादा किया, वो काबिले तारीफ हैं।
इससे पहले सुभाषिनी जी ने अपनी परनानी से जुड़ा एक किस्सा भी सुनाया। सुभाषिनी जी केरल के पालाघट जिले से ताल्लुक रखती हैं। उनकी परनानी मजबूत इरादों वाली महिला थी। अपनी जमींदारी की देखभाल ख़ुद करती थी। १९२० में जब चौरा चौरी के बाद हिंसा भड़की तो केरल में जमींदारों के खिलाफ भी जनांदोलन हुए। केरल में ज्यादातर जमींदार हिंदू थे और खेतिहर मजदूर मोपला मुस्लिम। ऐसी स्थिति हो तो हिंसा साम्प्रदाएईक् मोड़ ले लेती हैं। ऐसा हुआ भी पर मजाल था कि सुभाषिनी जी की परनानी का बाल भी बांका होता। मोपला विप्लव के दौर में ख़ुद दो मोपला भाइयो ने उनकी रक्षा की। क्योंकि वह बहुत भली महिला थी।
इन दोनों किस्सों के पीछे एक ही बात हैं। वह ये कि हमारे समाज का ताना बना ऐसा हैं कि यहाँ कोई किसी का बैरी नहीं। जरुरत पड़ने पर हिंदू क्या, क्या मुस्लिम, सब एक दूसरे के काम आते हैं। पर इस ताने बाने को बरकरार रखने का जिम्मा भी हमारा ही हैं। जब किसी खास मानसिकता वाले लोग जहर फैला कर अपना उल्लू सीधा करने में लगे हो, तब हमे यह जरूर सोचना चाहिए कि हम कैसे अपने बरसों पुराने सामाजिक ताने बाने को बचाए रखे।
सुभाषिनी जी को धन्यवाद कि उन्होंने मुझे प्रेरणा दी। न सिर्फ़ यह लिखने में, बल्कि ज़िंदगी की सहजता का एक और प्रमाण देकर। मैं कहीं पढ़ा था कि मोपला समुदाय में रामलीला का भी प्रचलन हैं। वो लोग अपने प्रतीक बनाकर रामलीला खेलते हैं और राम को रमन के नाम से पुकारते हैं। जिस संस्कृति ने हर व्यक्ति, हर समुदाय को अपनी आस्था ख़ुद विकसित करने की छूट दी हो उसके संस्कारों को बिखरने नही देना चाहिए। और उसे बनाये रखना हैं तो पहले इंसानों को उनके मजहब से अलग करके देखने की जरूरत हैं।
सुभाषिनी जी ने लेख के शीर्षक में सवाल किया है- 'हम आगे बढ़ रहे है या पीछे जा रहे है'। बेशक हमे आगे ही बढ़ना है। अगर ये चेतना लोगों में फैलाई जा सके तो ये असंभव क्यों कर होगा।

1 comment:

pranava priyadarshee said...

aamantrann paakar achchha lagaa. yahaan aakar aur achchha laga. tumhare blog par to kaafi kuchh hai yaar.
kavitaayen bhee achchhee hain. lagta hai yahaan niyamit roop seaana padega.
bus aamantrann dekar tum so mat jaana
pranav